श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.57

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्मा अप्यनुभावेन स्वेनैवावाप्तराधसे।

धर्म एव मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययुः॥ ५७

tasmā apyanubhāvena svenaivāvāptarādhase|

dharma eva matiṃ dattvā tridaśāste divaṃ yayuḥ|| 57

अर्थ

फिर जिन्हें अपने पुरुषार्थसे ही सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त थीं, उन दक्षप्रजापतिको ‘तुम्हारी सदा धर्ममें बुद्धि रहे’ ऐसा आशीर्वाद देकर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये॥ ५७॥

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