जिस प्रकार प्रलयकालमें लीन हुई शक्ति सृष्टिके आरम्भमें फिर ईश्वरका ही आश्रय लेती है, उसी प्रकार अनन्यपरायणा श्रीअम्बिकाजीने उस जन्ममें भी अपने एकमात्र आश्रय और प्रियतम भगवान् शंकरको ही वरण किया॥ ५९॥
तमेव दयितं भूय आवृङ्क्ते पतिमम्बिका।
अनन्यभावैकगतिं शक्तिः सुप्तेव पूरुषम्॥ ५९
जिस प्रकार प्रलयकालमें लीन हुई शक्ति सृष्टिके आरम्भमें फिर ईश्वरका ही आश्रय लेती है, उसी प्रकार अनन्यपरायणा श्रीअम्बिकाजीने उस जन्ममें भी अपने एकमात्र आश्रय और प्रियतम भगवान् शंकरको ही वरण किया॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 442) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/59/