उसके दोनों होठ फड़क रहे थे और वह सिसक-सिसककर रो रहा था। सुनीतिने बेटेको गोदमें उठा लिया और जब महलके दूसरे लोगोंसे अपनी सौत सुरुचिकी कही हुई बातें सुनी, तब उसे भी बड़ा दुःख हुआ॥ १५॥
तं निःश्वसन्तं स्फुरिताधरोष्ठं
सुनीतिरुत्संग उदूह्य बालम्।
निशम्य तत्पौरमुखान्नितान्तं
सा विव्यथे यद्गदितं सपत्न्या॥ १५
उसके दोनों होठ फड़क रहे थे और वह सिसक-सिसककर रो रहा था। सुनीतिने बेटेको गोदमें उठा लिया और जब महलके दूसरे लोगोंसे अपनी सौत सुरुचिकी कही हुई बातें सुनी, तब उसे भी बड़ा दुःख हुआ॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 444) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/15/