उसका धीरज टूट गया। वह दावानलसे जली हुई बेलके समान शोकसे सन्तप्त होकर मुरझा गयी तथा विलाप करने लगी। सौतकी बातें याद आनेसे उसके कमल-सरीखे नेत्रोंमें आँसू भर आये॥ १६॥
सोत्सृज्य धैर्यं विललाप शोक-
दावाग्निना दावलतेव बाला।
वाक्यं सपत्न्याः स्मरती सरोज-
श्रिया दृशा बाष्पकलामुवाह॥ १६
उसका धीरज टूट गया। वह दावानलसे जली हुई बेलके समान शोकसे सन्तप्त होकर मुरझा गयी तथा विलाप करने लगी। सौतकी बातें याद आनेसे उसके कमल-सरीखे नेत्रोंमें आँसू भर आये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 444) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/16/