श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सोत्सृज्य धैर्यं विललाप शोक-

दावाग्‍निना दावलतेव बाला।

वाक्यं सपत्न्याः स्मरती सरोज-

श्रिया दृशा बाष्पकलामुवाह॥ १६

sotsṛjya dhairyaṃ vilalāpa śoka-

dāvāgninā dāvalateva bālā|

vākyaṃ sapatnyāḥ smaratī saroja-

śriyā dṛśā bāṣpakalāmuvāha|| 16

अर्थ

उसका धीरज टूट गया। वह दावानलसे जली हुई बेलके समान शोकसे सन्तप्त होकर मुरझा गयी तथा विलाप करने लगी। सौतकी बातें याद आनेसे उसके कमल-सरीखे नेत्रोंमें आँसू भर आये॥ १६॥

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