श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यस्याङ्‌घ्रिपद्मं परिचर्य विश्‍व-

विभावनायात्तगुणाभिपत्तेः ।

अजोऽध्यतिष्ठत्खलु पारमेष्ठ्यं

पदं जितात्मश्‍वसनाभिवन्द्यम्॥ २०

yasyāṅghripadmaṃ paricarya viśva-

vibhāvanāyāttaguṇābhipatteḥ |

ajo'dhyatiṣṭhatkhalu pārameṣṭhyaṃ

padaṃ jitātmaśvasanābhivandyam|| 20

अर्थ

संसारका पालन करनेके लिये सत्त्वगुणको अंगीकार करनेवाले उन श्रीहरिके चरणोंकी आराधना करनेसे ही तेरे परदादा श्रीब्रह्माजीको वह सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है, जो मन और प्राणोंको जीतनेवाले मुनियोंके द्वारा भी वन्दनीय है॥ २०॥✎ 365 366

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #365 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीपुरुषोत्तमभगवान् को → श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌को
  • #366 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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