श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तथा मनुर्वो भगवान् पितामहो

यमेकमत्या पुरुदक्षिणैर्मखैः।

इष्ट्वाभिपेदे दुरवापमन्यतो

भौमं सुखं दिव्यमथापवर्ग्यम्॥ २१

tathā manurvo bhagavān pitāmaho

yamekamatyā purudakṣiṇairmakhaiḥ|

iṣṭvābhipede duravāpamanyato

bhaumaṃ sukhaṃ divyamathāpavargyam|| 21

अर्थ

इसी प्रकार तेरे दादा स्वायम्भुव मनुने भी बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले यज्ञोंके द्वारा अनन्यभावसे उन्हीं भगवान्‌की आराधना की थी; तभी उन्हें दूसरोंके लिये अति दुर्लभ लौकिक, अलौकिक तथा मोक्षसुखकी प्राप्ति हुई॥ २१॥✎ 365 366

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #365 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीपुरुषोत्तमभगवान् को → श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌को
  • #366 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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