श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नान्यं ततः पद्मपलाशलोचनाद्

दुःखच्छिदं ते मृगयामि कंचन।

यो मृग्यते हस्तगृहीतपद्मया

श्रियेतरैरंग विमृग्यमाणया॥ २३

nānyaṃ tataḥ padmapalāśalocanād

duḥkhacchidaṃ te mṛgayāmi kaṃcana|

yo mṛgyate hastagṛhītapadmayā

śriyetarairaṃga vimṛgyamāṇayā|| 23

अर्थ

बेटा! उन कमल-दल-लोचन श्रीहरिको छोड़कर मुझे तो तेरे दुःखको दूर करनेवाला और कोई दिखायी नहीं देता। देख, जिन्हें प्रसन्‍न करनेके लिये ब्रह्मा आदि अन्य सब देवता ढूँढ़ते रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मीजी भी दीपककी भाँति हाथमें कमल लिये निरन्तर उन्हीं श्रीहरिकी खोज किया करती हैं’॥ २३॥✎ 365 366

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #365 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीपुरुषोत्तमभगवान् को → श्रीपुरुषोत्तमभगवान्‌को
  • #366 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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