श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—माता सुनीतिने जो वचन कहे, वे अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका मार्ग दिखलानेवाले थे। अतः उन्हें सुनकर ध्रुवने बुद्धिद्वारा अपने चित्तका समाधान किया। इसके बाद वे पिताके नगरसे निकल पड़े॥ २४॥
एवं संजल्पितं मातुराकर्ण्यार्थागमं वचः।
संनियम्यात्मनाऽऽत्मानं निश्चक्राम पितुः पुरात्॥ २४
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—माता सुनीतिने जो वचन कहे, वे अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिका मार्ग दिखलानेवाले थे। अतः उन्हें सुनकर ध्रुवने बुद्धिद्वारा अपने चित्तका समाधान किया। इसके बाद वे पिताके नगरसे निकल पड़े॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 445) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/24/