श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

पदं त्रिभुवनोत्कृष्टं जिगीषोः साधु वर्त्म मे।

ब्रूह्यस्मत्पितृभिर्ब्रह्मन्‍नन्यैरप्यनधिष्ठितम्॥ ३७

padaṃ tribhuvanotkṛṣṭaṃ jigīṣoḥ sādhu vartma me|

brūhyasmatpitṛbhirbrahmannanyairapyanadhiṣṭhitam|| 37

अर्थ

ब्रह्मन्! मैं उस पदपर अधिकार करना चाहता हूँ, जो त्रिलोकीमें सबसे श्रेष्ठ है तथा जिसपर मेरे बाप-दादे और दूसरे कोई भी आरूढ़ नहीं हो सके हैं। आप मुझे उसीकी प्राप्तिका कोई अच्छा-सा मार्ग बतलाइये॥ ३७॥

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