श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

प्रसादाभिमुखं शश्‍वत्प्रसन्‍नवदनेक्षणम्।

सुनासं सुभ्रुवं चारुकपोलं सुरसुन्दरम्॥ ४५

prasādābhimukhaṃ śaśvatprasannavadanekṣaṇam|

sunāsaṃ subhruvaṃ cārukapolaṃ surasundaram|| 45

अर्थ

भगवान्‌के नेत्र और मुख निरन्तर प्रसन्‍न रहते हैं; उन्हें देखनेसे ऐसा मालूम होता है कि वे प्रसन्‍नतापूर्वक भक्तको वर देनेके लिये उद्यत हैं। उनकी नासिका, भौंहें और कपोल बड़े ही सुहावने हैं; वे सभी देवताओंमें परम सुन्दर हैं॥ ४५॥

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