श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तरुणं रमणीयांगमरुणोष्ठेक्षणाधरम्।

प्रणताश्रयणं नृम्णं शरण्यं करुणार्णवम्॥ ४६

taruṇaṃ ramaṇīyāṃgamaruṇoṣṭhekṣaṇādharam|

praṇatāśrayaṇaṃ nṛmṇaṃ śaraṇyaṃ karuṇārṇavam|| 46

अर्थ

उनकी तरुण अवस्था है; सभी अंग बड़े सुडौल हैं; लाल-लाल होठ और रतनारे नेत्र हैं। वे प्रणतजनोंको आश्रय देनेवाले, अपार सुखदायक, शरणागतवत्सल और दयाके समुद्र हैं॥ ४६॥✎ 369

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #369 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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