श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.58

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

परिचर्या भगवतो यावत्यः पूर्वसेविताः।

ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये॥ ५८

paricaryā bhagavato yāvatyaḥ pūrvasevitāḥ|

tā mantrahṛdayenaiva prayuñjyānmantramūrtaye|| 58

अर्थ

प्रभुकी पूजाके लिये जिन-जिन उपचारोंका विधान किया गया है, उन्हें मन्त्रमूर्ति श्रीहरिको द्वादशाक्षर मन्त्रके द्वारा ही अर्पण करे॥ ५८॥✎ 371

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #371 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें