श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एवं कायेन मनसा वचसा च मनोगतम्।

परिचर्यमाणो भगवान् भक्तिमत्परिचर्यया॥ ५९

evaṃ kāyena manasā vacasā ca manogatam|

paricaryamāṇo bhagavān bhaktimatparicaryayā|| 59

अर्थ

इस प्रकार जब हृदयस्थित हरिका मन, वाणी और शरीरसे भक्तिपूर्वक पूजन किया जाता है, तब वे निश्छलभावसे भलीभाँति भजन करनेवाले अपने भक्तोंके भावको बढ़ा देते हैं और उन्हें उनकी इच्छाके अनुसार धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षरूप कल्याण प्रदान करते हैं॥ ५९-६०॥

यह अर्थ श्लोक 59–60 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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