इधर ध्रुवजीने मधुवनमें पहुँचकर यमुनाजीमें स्नान किया और उस रात पवित्रतापूर्वक उपवास करके श्रीनारदजीके उपदेशानुसार एकाग्रचित्तसे परमपुरुष श्रीनारायणकी उपासना आरम्भ कर दी॥ ७१॥✎ 3721323
तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम्।
समाहितः पर्यचरदृष्यादेशेन पूरुषम्॥ ७१
इधर ध्रुवजीने मधुवनमें पहुँचकर यमुनाजीमें स्नान किया और उस रात पवित्रतापूर्वक उपवास करके श्रीनारदजीके उपदेशानुसार एकाग्रचित्तसे परमपुरुष श्रीनारायणकी उपासना आरम्भ कर दी॥ ७१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.71 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 450) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/71/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)