श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.71

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम्।

समाहितः पर्यचरदृष्यादेशेन पूरुषम्॥ ७१

tatrābhiṣiktaḥ prayatastāmupoṣya vibhāvarīm|

samāhitaḥ paryacaradṛṣyādeśena pūruṣam|| 71

अर्थ

इधर ध्रुवजीने मधुवनमें पहुँचकर यमुनाजीमें स्नान किया और उस रात पवित्रतापूर्वक उपवास करके श्रीनारदजीके उपदेशानुसार एकाग्रचित्तसे परमपुरुष श्रीनारायणकी उपासना आरम्भ कर दी॥ ७१॥✎ 372 1323

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #372 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1323 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पवित्रता-पूर्वक → पवित्रतापूर्वक

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