श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—देवर्षि नारदजीकी बात सुनकर महाराज उत्तानपाद राजपाटकी ओरसे उदासीन होकर निरन्तर पुत्रकी ही चिन्तामें रहने लगे॥ ७०॥✎ 3721323
इति देवर्षिणा प्रोक्तं विश्रुत्य जगतीपतिः।
राजलक्ष्मीमनादृत्य पुत्रमेवान्वचिन्तयत्॥ ७०
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—देवर्षि नारदजीकी बात सुनकर महाराज उत्तानपाद राजपाटकी ओरसे उदासीन होकर निरन्तर पुत्रकी ही चिन्तामें रहने लगे॥ ७०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.70 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 450) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/70/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)