श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ध्रुव उवाच

समाधिना नैकभवेन यत्पदं

विदुः सनन्दादय ऊर्ध्वरेतसः।

मासैरहं षड्भिरमुष्य पादयो-

श्छायामुपेत्यापगतः पृथङ्मतिः॥ ३०

samādhinā naikabhavena yatpadaṃ

viduḥ sanandādaya ūrdhvaretasaḥ|

māsairahaṃ ṣaḍbhiramuṣya pādayo-

śchāyāmupetyāpagataḥ pṛthaṅmatiḥ|| 30

अर्थ

ध्रुवजी मन-ही-मन कहने लगे—अहो! सनकादि ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) सिद्ध भी जिन्हें समाधिद्वारा अनेकों जन्मोंमें प्राप्त कर पाते हैं, उन भगवच्चरणोंकी छायाको मैंने छः महीनेमें ही पा लिया, किन्तु चित्तमें दूसरी वासना रहनेके कारण मैं फिर उनसे दूर हो गया॥ ३०॥

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