॥ श्रीहरिः ॥
अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत।
भवच्छिदः पादमूलं गत्वायाचे यदन्तवत्॥ ३१
aho bata mamānātmyaṃ mandabhāgyasya paśyata|
bhavacchidaḥ pādamūlaṃ gatvāyāce yadantavat|| 31
अर्थ
अहो! मुझ मन्दभाग्यकी मूर्खता तो देखो, मैंने संसार-पाशको काटनेवाले प्रभुके पादपद्मोंमें पहुँचकर भी उनसे नाशवान् वस्तुकी ही याचना की!॥ ३१॥
अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत।
भवच्छिदः पादमूलं गत्वायाचे यदन्तवत्॥ ३१
अहो! मुझ मन्दभाग्यकी मूर्खता तो देखो, मैंने संसार-पाशको काटनेवाले प्रभुके पादपद्मोंमें पहुँचकर भी उनसे नाशवान् वस्तुकी ही याचना की!॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 456) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/31/