श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत।

ईश्‍वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः॥ ३५

svārājyaṃ yacchato mauḍhyānmāno me bhikṣito bata|

īśvarātkṣīṇapuṇyena phalīkārānivādhanaḥ|| 35

अर्थ

मैं बड़ा ही पुण्यहीन हूँ! जिस प्रकार कोई कँगला किसी चक्रवर्ती सम्राट्को प्रसन्‍न करके उससे तुषसहित चावलोंकी कनी माँगे, उसी प्रकार मैंने भी आत्मानन्द प्रदान करनेवाले श्रीहरिसे मूर्खतावश व्यर्थका अभिमान बढ़ानेवाले उच्चपदादि ही माँगे हैं॥ ३५॥✎ 377 1598

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #377 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1598 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तपस्या-द्वारा → तपस्याद्वारा

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