श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

न वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयो

रजोजुषस्तात भवादृशा जनाः।

वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेऽर्थमात्मनो

यदृच्छया लब्धमनःसमृद्धयः॥ ३६

na vai mukundasya padāravindayo

rajojuṣastāta bhavādṛśā janāḥ|

vāñchanti taddāsyamṛte'rthamātmano

yadṛcchayā labdhamanaḥsamṛddhayaḥ|| 36

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—तात! तुम्हारी तरह जो लोग श्रीमुकुन्दपादारविन्द-मकरन्दके ही मधुकर हैं—जो निरन्तर प्रभुकी चरण-रजका ही सेवन करते हैं और जिनका मन अपने-आप आयी हुई सभी परिस्थितियोंमें सन्तुष्ट रहता है, वे भगवान्‌से उनकी सेवाके सिवा अपने लिये और कोई भी पदार्थ नहीं माँगते॥ ३६॥✎ 378

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #378 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें