rājā na śraddadhe bhadramabhadrasya kuto mama|| 37
अर्थ
इधर जब राजा उत्तानपादने सुना कि उनका पुत्र ध्रुव घर लौट रहा है, तो उन्हें इस बातपर वैसे ही विश्वास नहीं हुआ जैसे कोई किसीके यमलोकसे लौटनेकी बातपर विश्वास न करे। उन्होंने यह सोचा कि ‘मुझ अभागेका ऐसा भाग्य कहाँ ’॥ ३७॥✎ 1946
आकर्ण्यात्मजमायान्तं सम्परेत्य यथाऽऽगतम्।
राजा न श्रद्दधे भद्रमभद्रस्य कुतो मम॥ ३७
इधर जब राजा उत्तानपादने सुना कि उनका पुत्र ध्रुव घर लौट रहा है, तो उन्हें इस बातपर वैसे ही विश्वास नहीं हुआ जैसे कोई किसीके यमलोकसे लौटनेकी बातपर विश्वास न करे। उन्होंने यह सोचा कि ‘मुझ अभागेका ऐसा भाग्य कहाँ ’॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 457) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1946 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बिभूषित → विभूषित