परन्तु फिर उन्हें देवर्षि नारदकी बात याद आ गयी। इससे उनका इस बातमें विश्वास हुआ और वे आनन्दके वेगसे अधीर हो उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह समाचार लानेवालेको एक बहुमूल्य हार दिया॥ ३८॥✎ 1946
श्रद्धाय वाक्यं देवर्षेर्हर्षवेगेन धर्षितः।
वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम्॥ ३८
परन्तु फिर उन्हें देवर्षि नारदकी बात याद आ गयी। इससे उनका इस बातमें विश्वास हुआ और वे आनन्दके वेगसे अधीर हो उठे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह समाचार लानेवालेको एक बहुमूल्य हार दिया॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 457) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1946 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): बिभूषित → विभूषित