आपने अवश्य ही शरणागतभयभंजन श्रीहरिकी उपासना की है। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं’॥ ५२॥
अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा।
यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम्॥ ५२
आपने अवश्य ही शरणागतभयभंजन श्रीहरिकी उपासना की है। उनका निरन्तर ध्यान करनेवाले धीर पुरुष परम दुर्जय मृत्युको भी जीत लेते हैं’॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 459) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/52/