विदुरजी! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, उसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे॥ ५३॥
लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः।
आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम्॥ ५३
विदुरजी! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, उसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 459) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/53/