श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.53

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः।

आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम्॥ ५३

lālyamānaṃ janairevaṃ dhruvaṃ sabhrātaraṃ nṛpaḥ|

āropya kariṇīṃ hṛṣṭaḥ stūyamāno'viśatpuram|| 53

अर्थ

विदुरजी! इस प्रकार जब सभी लोग ध्रुवके प्रति अपना लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, उसी समय उन्हें भाई उत्तमके सहित हथिनीपर चढ़ाकर महाराज उत्तानपादने बड़े हर्षके साथ राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय सभी लोग उनके भाग्यकी बड़ाई कर रहे थे॥ ५३॥

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