॥ श्रीहरिः ॥
यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।
मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः॥ ६२
yatra sphaṭikakuḍyeṣu mahāmārakateṣu ca|
maṇipradīpā ābhānti lalanāratnasaṃyutāḥ|| 62
अर्थ
उसकी स्फटिक और महामरकतमणि (पन्ने)-की दीवारोंमें रत्नोंकी बनी हुई स्त्रीमूर्तियोंपर रखे हुए मणिमय दीपक जगमगा रहे थे॥ ६२॥
यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च।
मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः॥ ६२
उसकी स्फटिक और महामरकतमणि (पन्ने)-की दीवारोंमें रत्नोंकी बनी हुई स्त्रीमूर्तियोंपर रखे हुए मणिमय दीपक जगमगा रहे थे॥ ६२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.62 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 460) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/62/