उस महलके चारों ओर अनेक जातिके दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित उद्यान थे, जिनमें नर और मादा पक्षियोंका कलरव तथा मतवाले भौंरोंका गुंजार होता रहता था॥ ६३॥
उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमैः।
कूजद्विहंगमिथुनैर्गायन्मत्तमधुव्रतैः ॥ ६३
उस महलके चारों ओर अनेक जातिके दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित उद्यान थे, जिनमें नर और मादा पक्षियोंका कलरव तथा मतवाले भौंरोंका गुंजार होता रहता था॥ ६३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.9.63 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 460) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/9/63/