तुमलोगोंकी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार और प्राकृत प्रकाश भी दूर हो रहा है। हम धर्मराजके सेवक हैं। हमें तुमलोग क्यों रोक रहे हो?’॥ ३६॥
दिशो वितिमिरालोकाः कुर्वन्तः स्वेन रोचिषा।
किमर्थं धर्मपालस्य किङ्करान्नो निषेधथ॥ ३६
तुमलोगोंकी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार और प्राकृत प्रकाश भी दूर हो रहा है। हम धर्मराजके सेवक हैं। हमें तुमलोग क्यों रोक रहे हो?’॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 699) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/36/