निष्पाप पुरुषो! जो प्राणी कर्म करते हैं, उनका गुणोंसे सम्बन्ध रहता ही है। इसीलिये सभीसे कुछ पाप और कुछ पुण्य होते ही हैं और देहवान् होकर कोई भी पुरुष कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता॥ ४४॥✎ 1949
सम्भवन्ति हि भद्राणि विपरीतानि चानघाः।
कारिणां गुणसङ्गोऽस्ति देहवान् न ह्यकर्मकृत्॥ ४४
निष्पाप पुरुषो! जो प्राणी कर्म करते हैं, उनका गुणोंसे सम्बन्ध रहता ही है। इसीलिये सभीसे कुछ पाप और कुछ पुण्य होते ही हैं और देहवान् होकर कोई भी पुरुष कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 700) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/44/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1949 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मुनष्य → मनुष्य