श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.65

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

विप्रां स्वभार्यामप्रौढां कुले महति लम्भिताम्।

विससर्जाचिरात्पापः स्वैरिण्यापाङ्गविद्धधीः॥ ६५

viprāṃ svabhāryāmaprauḍhāṃ kule mahati lambhitām|

visasarjācirātpāpaḥ svairiṇyāpāṅgaviddhadhīḥ|| 65

अर्थ

उस स्वच्छन्दचारिणी कुलटाकी तिरछी चितवनने इसके मनको ऐसा लुभा लिया कि इसने अपनी कुलीन नवयुवती और विवाहिता पत्नीतकका परित्याग कर दिया। इसके पापकी भी भला कोई सीमा है॥ ६५॥

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