श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.66

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यतस्ततश्चोपनिन्ये न्यायतोऽन्यायतो धनम्।

बभारास्याः कुटुम्बिन्याः कुटुम्बं मन्दधीरयम्॥ ६६

yatastataścopaninye nyāyato'nyāyato dhanam|

babhārāsyāḥ kuṭumbinyāḥ kuṭumbaṃ mandadhīrayam|| 66

अर्थ

यह कुबुद्धि न्यायसे, अन्यायसे जैसे भी जहाँ कहीं भी धन मिलता, वहींसे उठा लाता। उस वेश्याके बड़े कुटुम्बका पालन करनेमें ही यह व्यस्त रहता॥ ६६॥

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