इस पापीने शास्त्राज्ञाका उल्लंघन करके स्वच्छन्द आचरण किया है। यह सत्पुरुषोंके द्वारा निन्दित है। इसने बहुत दिनोंतक वेश्याके मल-समान अपवित्र अन्नसे अपना जीवन व्यतीत किया है, इसका सारा जीवन ही पापमय है॥ ६७॥
यदसौ शास्त्रमुल्लङ्घ्य स्वैरचार्यार्यगर्हितः।
अवर्तत चिरं कालमघायुरशुचिर्मलात्॥ ६७
इस पापीने शास्त्राज्ञाका उल्लंघन करके स्वच्छन्द आचरण किया है। यह सत्पुरुषोंके द्वारा निन्दित है। इसने बहुत दिनोंतक वेश्याके मल-समान अपवित्र अन्नसे अपना जीवन व्यतीत किया है, इसका सारा जीवन ही पापमय है॥ ६७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.67 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 703) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/67/