श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.5.26

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ब्रह्मबन्धो किमेतत्ते विपक्षं श्रयतासता।

असारं ग्राहितो बालो मामनादृत्य दुर्मते॥ २६

brahmabandho kimetatte vipakṣaṃ śrayatāsatā|

asāraṃ grāhito bālo māmanādṛtya durmate|| 26

अर्थ

रे नीच ब्राह्मण! यह तेरी कैसी करतूत है; दुर्बुद्धि! तूने मेरी कुछ भी परवा न करके इस बच्चेको कैसी निस्सार शिक्षा दे दी? अवश्य ही तू हमारे शत्रुओंके आश्रित है॥ २६॥✎ 588 1958

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्‌की
  • #1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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