संसारमें ऐसे दुष्टोंकी कमी नहीं है, जो मित्रका बाना धारणकर छिपे-छिपे शत्रुका काम करते हैं। परन्तु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालोंका पाप समयपर रोगके रूपमें प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है॥ २७॥✎ 5881958
सन्ति ह्यसाधवो लोके दुर्मैत्राश्छद्मवेषिणः।
तेषामुदेत्यघं काले रोगः पातकिनामिव॥ २७
संसारमें ऐसे दुष्टोंकी कमी नहीं है, जो मित्रका बाना धारणकर छिपे-छिपे शत्रुका काम करते हैं। परन्तु उनकी कलई ठीक वैसे ही खुल जाती है, जैसे छिपकर पाप करनेवालोंका पाप समयपर रोगके रूपमें प्रकट होकर उनकी पोल खोल देता है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 831) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/5/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#588 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् की → विष्णुभगवान्की
#1958 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा