॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.1.16
त४मीहमानं निरहङ्कृतं बुधं
निराशिषं पूर्णमनन्यचोदितम्।
नॄन् शिक्षयन्तं निजवर्त्मसंस्थितं ✎ 1107
प्रभुं प्रपद्येऽखिलधर्मभावनम्॥ १६
tamīhamānaṃ nirahaṅkṛtaṃ budhaṃ
nirāśiṣaṃ pūrṇamananyacoditam|
nṝn śikṣayantaṃ nijavartmasaṃsthitaṃ
prabhuṃ prapadye'khiladharmabhāvanam|| 16
अर्थ
भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये उनमें अहंकारका लेश भी नहीं है। वे सर्वतः परिपूर्ण हैं, इसलिये उन्हें किसी वस्तुकी कामना नहीं है। वे बिना किसीकी प्रेरणाके स्वच्छन्दरूपसे ही कर्म करते हैं। वे अपनी ही बनायी हुई मर्यादामें स्थित रहकर अपने कर्मोंके द्वारा मनुष्योंको शिक्षा देते हैं। वे ही समस्त धर्मोंके प्रवर्तक और उनके जीवनदाता हैं। मैं उन्हीं प्रभुकी शरणमें हूँ॥ १६॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—आनन्दमेकं परमं सनातनं।