श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक बार स्वायम्भुव मनु एकाग्रचित्तसे इस मन्त्रमय उपनिषत्-स्वरूप श्रुतिका पाठ कर रहे थे। उन्हें नींदमें अचेत होकर बड़बड़ाते जान भूखे असुर और राक्षस खा डालनेके लिये उनपर टूट पड़े॥ १७॥
इति मन्त्रोपनिषदं व्याहरन्तं समाहितम्।
दृष्ट्वासुरा यातुधाना जग्धुमभ्यद्रवन् क्षुधा॥ १७
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक बार स्वायम्भुव मनु एकाग्रचित्तसे इस मन्त्रमय उपनिषत्-स्वरूप श्रुतिका पाठ कर रहे थे। उन्हें नींदमें अचेत होकर बड़बड़ाते जान भूखे असुर और राक्षस खा डालनेके लिये उनपर टूट पड़े॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.1.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 907) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/1/17/