श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सूत उवाच

परीक्षितैवं स तु बादरायणिः

प्रायोपविष्टेन कथासु चोदितः।

उवाच विप्राः प्रतिनन्द्य पार्थिवं

मुदा मुनीनां सदसि स्म शृण्वताम्॥ ३३

parīkṣitaivaṃ sa tu bādarāyaṇiḥ

prāyopaviṣṭena kathāsu coditaḥ|

uvāca viprāḥ pratinandya pārthivaṃ

mudā munīnāṃ sadasi sma śṛṇvatām|| 33

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षित् आमरण अनशन करके कथा सुननेके लिये ही बैठे हुए थे। उन्होंने जब श्रीशुकदेवजी महाराजको इस प्रकार कथा कहनेके लिये प्रेरित किया, तब वे बड़े आनन्दित हुए और प्रेमसे परीक्षित‍्का अभिनन्दन करके मुनियोंकी भरी सभामें कहने लगे॥ ३३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे
मन्वन्तरानुचरिते प्रथमोऽध्यायः
॥ १॥

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