श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अथ दशमोऽध्यायः

देवासुर-संग्राम

श्रीशुक उवाच

इति दानवदैतेया नाविन्दन्‍नमृतं नृप।

युक्ताः कर्मणि यत्ताश्‍च वासुदेवपराङ्मुखाः॥ १

iti dānavadaiteyā nāvindannamṛtaṃ nṛpa|

yuktāḥ karmaṇi yattāśca vāsudevaparāṅmukhāḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! यद्यपि दानवों और दैत्योंने बड़ी सावधानीसे समुद्रमन्थनकी चेष्टा की थी, फिर भी भगवान्‌से विमुख होनेके कारण उन्हें अमृतकी प्राप्ति नहीं हुई॥ १॥✎ 723 724

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #723 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #724 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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