॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.9.29
यद् युज्यतेऽसुवसुकर्ममनोवचोभि-
र्देहात्मजादिषु नृभिस्तदसत् पृथक्त्वात्।
तैरेव सद् भवति यत् क्रियतेऽपृथक्त्वात्
सर्वस्य तद् भवति मूलनिषेचनं यत्॥ २९
yad yujyate'suvasukarmamanovacobhi-
rdehātmajādiṣu nṛbhistadasat pṛthaktvāt|
taireva sad bhavati yat kriyate'pṛthaktvāt
sarvasya tad bhavati mūlaniṣecanaṃ yat|| 29
अर्थ
मनुष्य अपने प्राण, धन, कर्म, मन और वाणी आदिसे शरीर एवं पुत्र आदिके लिये जो कुछ करता है—वह व्यर्थ ही होता है; क्योंकि उसके मूलमें भेदबुद्धि बनी रहती है। परन्तु उन्हीं प्राण आदि वस्तुओंके द्वारा भगवान्के लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब भेदभावसे रहित होनेके कारण अपने शरीर, पुत्र और समस्त संसारके लिये सफल हो जाता है। जैसे वृक्षकी जड़में पानी देनेसे उसका तना, टहनियाँ और पत्ते—सब-के-सब सिंच जाते हैं, वैसे ही भगवान्के लिये कर्म करनेसे वे सबके लिये हो जाते हैं॥ २९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धेऽमृतमथने नवमोऽध्यायः॥ ९॥