श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सर्वसाङ्ग्रामिकोपेतं सर्वाश्‍चर्यमयं प्रभो।

अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं दृश्यमानमदर्शनम्॥ १७

sarvasāṅgrāmikopetaṃ sarvāścaryamayaṃ prabho|

apratarkyamanirdeśyaṃ dṛśyamānamadarśanam|| 17

अर्थ

युद्धकी समस्त सामग्रियाँ उसमें सुसज्जित थीं। परीक्षित्! वह इतना आश्‍चर्यमय था कि कभी दिखलायी पड़ता तो कभी अदृश्य हो जाता। वह इस समय कहाँ है—जब इस बातका अनुमान भी नहीं किया जा सकता था तब बतलाया तो कैसे जा सकता था॥ १७॥✎ 2032 2033

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2032 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2033 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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