श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.10.24

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सिंहनादान्विमुञ्चन्तः शङ्खान्दध्मुर्महारवान्।

दृष्ट्वा सपत्नानुत्सिक्तान्बलभित् कुपितो भृशम्॥ २४

siṃhanādānvimuñcantaḥ śaṅkhāndadhmurmahāravān|

dṛṣṭvā sapatnānutsiktānbalabhit kupito bhṛśam|| 24

अर्थ

इसलिये वे बड़े उत्साहसे सिंहनाद करते हुए अपने घोर स्वरवाले शंख बजाने लगे। इन्द्रने देखा कि हमारे शत्रुओंका मन बढ़ रहा है, ये मदोन्मत्त हो रहे हैं; तब उन्हें बड़ा क्रोध आया॥ २४॥✎ 2032 2033

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2032 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2033 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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