॥ श्रीहरिः ॥
ततो निपेतुस्तरवो दह्यमाना दवाग्निना।
शिलाः सटङ्कशिखराश्चूर्णयन्त्यो द्विषद्बलम्॥ ४६
tato nipetustaravo dahyamānā davāgninā|
śilāḥ saṭaṅkaśikharāścūrṇayantyo dviṣadbalam|| 46
अर्थ
उस पर्वतसे दावाग्निसे जलते हुए वृक्ष और टाँकी-जैसी तीखी धारवाले शिखरोंके साथ नुकीली शिलाएँ गिरने लगीं। इससे देवताओंकी सेना चकनाचूर होने लगी॥ ४६॥
ततो निपेतुस्तरवो दह्यमाना दवाग्निना।
शिलाः सटङ्कशिखराश्चूर्णयन्त्यो द्विषद्बलम्॥ ४६
उस पर्वतसे दावाग्निसे जलते हुए वृक्ष और टाँकी-जैसी तीखी धारवाले शिखरोंके साथ नुकीली शिलाएँ गिरने लगीं। इससे देवताओंकी सेना चकनाचूर होने लगी॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 955) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/46/