॥ श्रीहरिः ॥
यातुधान्यश्च शतशः शूलहस्ता विवाससः।
छिन्धि भिन्धीति वादिन्यस्तथा रक्षोगणाः प्रभो॥ ४८
yātudhānyaśca śataśaḥ śūlahastā vivāsasaḥ|
chindhi bhindhīti vādinyastathā rakṣogaṇāḥ prabho|| 48
अर्थ
परीक्षित्! हाथोंमें शूल लिये ‘मारो-काटो’ इस प्रकार चिल्लाती हुई सैकड़ों नंग-धड़ंग राक्षसियाँ और राक्षस भी वहाँ प्रकट हो गये॥ ४८॥
यातुधान्यश्च शतशः शूलहस्ता विवाससः।
छिन्धि भिन्धीति वादिन्यस्तथा रक्षोगणाः प्रभो॥ ४८
परीक्षित्! हाथोंमें शूल लिये ‘मारो-काटो’ इस प्रकार चिल्लाती हुई सैकड़ों नंग-धड़ंग राक्षसियाँ और राक्षस भी वहाँ प्रकट हो गये॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.10.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/10/48/