श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.1

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

देवासुर-संग्रामकी समाप्ति

श्रीशुक उवाच

अथो सुराः प्रत्युपलब्धचेतसः

परस्य पुंसः परयानुकम्पया।

जघ्नुर्भृशं शक्रसमीरणादय-

स्तांस्तान्रणे यैरभिसंहताः पुरा॥ १

atho surāḥ pratyupalabdhacetasaḥ

parasya puṃsaḥ parayānukampayā|

jaghnurbhṛśaṃ śakrasamīraṇādaya-

stāṃstānraṇe yairabhisaṃhatāḥ purā|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! परम पुरुष भगवान्‌की अहैतुकी कृपासे देवताओंकी घबराहट जाती रही, उनमें नवीन उत्साहका संचार हो गया। पहले इन्द्र, वायु आदि देवगण रणभूमिमें जिन-जिन दैत्योंसे आहत हुए थे, उन्हींके ऊपर अब वे पूरी शक्तिसे प्रहार करने लगे॥ १॥✎ 730

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #730 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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