श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.18

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

सेहे रुजं सुदुर्मर्षां सत्त्वमालम्ब्य मातलिः।

इन्द्रो जम्भस्य संक्रुद्धो वज्रेणापाहरच्छिरः॥ १८

sehe rujaṃ sudurmarṣāṃ sattvamālambya mātaliḥ|

indro jambhasya saṃkruddho vajreṇāpāharacchiraḥ|| 18

अर्थ

मातलिने धैर्यके साथ इस असह्य पीड़ाको सह लिया। तब इन्द्रने क्रोधित होकर अपने वज्रसे जम्भका सिर काट डाला॥ १८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें