श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.11.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

वज्रपाणिस्तमाहेदं तिरस्कृत्य पुरःस्थितम्।

मनस्विनं सुसम्पन्‍नं विचरन्तं महामृधे॥ ३

vajrapāṇistamāhedaṃ tiraskṛtya puraḥsthitam|

manasvinaṃ susampannaṃ vicarantaṃ mahāmṛdhe|| 3

अर्थ

बलि अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित होकर बड़े उत्साहसे युद्धभूमिमें बड़ी निर्भयतासे डटकर विचर रहे थे। उनको अपने सामने ही देखकर हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्रने उनका तिरस्कार करके कहा—॥ ३॥✎ 730

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #730 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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