॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.11.35
तपःसारमयं त्वाष्ट्रं वृत्रो येन विपाटितः।
अन्ये चापि३ बलोपेताः सर्वास्त्रैरक्षतत्वचः॥ ३५
tapaḥsāramayaṃ tvāṣṭraṃ vṛtro yena vipāṭitaḥ|
anye cāpi balopetāḥ sarvāstrairakṣatatvacaḥ|| 35
अर्थ
त्वष्टाकी तपस्याका सार ही वृत्रासुरके रूपमें प्रकट हुआ था! उसे भी मैंने इसी वज्रके द्वारा काट डाला था। और भी अनेकों दैत्य, जो बहुत बलवान् थे और किसी अस्त्र-शस्त्रसे जिनके चमड़ेको भी चोट नहीं पहुँचायी जा सकी थी, इसी वज्रसे मैंने मृत्युके घाट उतार दिये थे॥ ३५॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—चातिबलो०।