इस प्रकार इन्द्र विषाद करने लगे। उसी समय यह आकाशवाणी हुई—‘‘यह दानव न तो सूखी वस्तुसे मर सकता है, न गीलीसे॥ ३७॥
इति शक्रं विषीदन्तमाह वागशरीरिणी।
नायं शुष्कैरथो नार्द्रैर्वधमर्हति दानवः॥ ३७
इस प्रकार इन्द्र विषाद करने लगे। उसी समय यह आकाशवाणी हुई—‘‘यह दानव न तो सूखी वस्तुसे मर सकता है, न गीलीसे॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.11.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 961) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/11/37/