श्रीविष्णुभगवान्ने कहा—शंकरजी! उस समय अमृतका कलश दैत्योंके हाथमें चला गया था। अतः देवताओंका काम बनानेके लिये और दैत्योंका मन एक नये कौतूहलकी ओर खींच लेनेके लिये ही मैंने वह स्त्रीरूप धारण किया था॥ १५॥✎ 733
कौतूहलाय दैत्यानां योषिद्वेषो मया कृतः।
पश्यता सुरकार्याणि गते पीयूषभाजने॥ १५
श्रीविष्णुभगवान्ने कहा—शंकरजी! उस समय अमृतका कलश दैत्योंके हाथमें चला गया था। अतः देवताओंका काम बनानेके लिये और दैत्योंका मन एक नये कौतूहलकी ओर खींच लेनेके लिये ही मैंने वह स्त्रीरूप धारण किया था॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 965) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#733 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् ने → श्रीविष्णुभगवान्ने