श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सभाजितो भगवता सादरं सोमया भवः।

सूपविष्ट उवाचेदं प्रतिपूज्य१ स्मयन्हरिम्॥ ३

sabhājito bhagavatā sādaraṃ somayā bhavaḥ|

sūpaviṣṭa uvācedaṃ pratipūjya smayanharim|| 3

अर्थ

भगवान् श्रीहरिने बड़े प्रेमसे गौरी-शंकरभगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया। वे भी सुखसे बैठकर भगवान्‌का सम्मान करके मुसकराते हुए बोले॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रतिगृह्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 963)

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