श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.12.34

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सरित्सरस्सु शैलेषु वनेषूपवनेषु च।

यत्र क्‍व चासन्‍नृषयस्तत्र संनिहितो हरः॥ ३४

saritsarassu śaileṣu vaneṣūpavaneṣu ca|

yatra kva cāsannṛṣayastatra saṃnihito haraḥ|| 34

अर्थ

परीक्षित्! नदी, सरोवर, पर्वत, वन और उपवनमें एवं जहाँ-जहाँ ऋषि-मुनि निवास करते थे, वहाँ वहाँ मोहिनीके पीछे-पीछे भगवान् शंकर गये थे॥ ३४॥✎ 734 735 736 737 738

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #734 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #735 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #736 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #737 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #738 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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