॥ श्रीहरिः ॥
यत्र यत्रापतन्मह्यां रेतस्तस्य महात्मनः।
तानि रूप्यस्य हेम्नश्च क्षेत्राण्यासन्महीपते॥ ३३
yatra yatrāpatanmahyāṃ retastasya mahātmanaḥ|
tāni rūpyasya hemnaśca kṣetrāṇyāsanmahīpate|| 33
अर्थ
भगवान् शंकरका वीर्य पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ-वहाँ सोने-चाँदीकी खानें बन गयीं॥ ३३॥✎ 734 735 736 737 738
यत्र यत्रापतन्मह्यां रेतस्तस्य महात्मनः।
तानि रूप्यस्य हेम्नश्च क्षेत्राण्यासन्महीपते॥ ३३
भगवान् शंकरका वीर्य पृथ्वीपर जहाँ-जहाँ गिरा, वहाँ-वहाँ सोने-चाँदीकी खानें बन गयीं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.12.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 967) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/12/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
- #734 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने
- #735 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #736 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #737 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #738 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की